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बुधवार, 2 सितंबर 2020

श्राद्ध क्या है और उसे क्यों मनाया जाता है इसके बारे में जानने का प्रयास करते हैं।


श्राद्ध क्या है और उसे क्यों मनाया जाता है इसके बारे में जानने का प्रयास करते हैं।

क्या है श्राद्ध?

आज यह समझने का प्रयास करते हैं कि क्या है श्राद्ध? यह एक अंधविश्वास है?इसे मनाना क्यों जरूरी है? श्राद्ध कर्म कब से शुरू हुए? यह सिर्फ अंधविश्वास है या इसका कोई आधार है?
पितृ पक्ष जिसे श्राद्ध  कहा जाता है, इसके श्राद्ध पूर्णिमा के साथ शुरू होकर सोलह दिनों के बाद सर्व पितृ अमावस्या के दिन समाप्त होता है। श्राद्ध पक्ष के दरमियान हिंदू अपने पूर्वजों (अर्थात पितरों) को विशेष रूप से भोजन प्रसाद के माध्यम से सम्मान, धन्यवाद श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
ऐसा माना जाता है कि श्राद्ध के समय, पूर्वज अपने रिश्तेदारों को आशीर्वाद देने के लिए पृथ्वी पर आते हैं। श्राद्ध कर्म की व्याख्या रामायण और महाभारत दोनों ही महाकाव्य में मिलती है।

महाभारत में वर्णित पितृ पक्षका प्रसंग
श्राद्ध का एक प्रसंग महाभारत महाकाव्य से इस प्रकार है, कौरव-पांडवों के बीच युद्ध समाप्ति के बाद, जब सब कुछ समाप्त हो गया, दानवीर कर्ण मृत्यु के बाद स्वर्ग पहुंचे। उन्हें खाने में सोना, चांदी और गहने भोजन की जगह परोसे गये। इस पर, उन्होंने स्वर्ग के स्वामी इंद्र से इसका कारण पूछा।
इस पर, इंद्र ने कर्ण को बताया कि पूरे जीवन में उन्होंने सोने, चांदी और हीरों का ही दान किया, परंतु कभी भी अपने पूर्वजों के नाम पर कोई भोजन नहीं दान किया। कर्ण ने इसके उत्तर में कहा कि, उन्हें अपने पूर्वजों के बारे मैं कोई ज्ञान नहीं था, अत: वह ऐसा करने में असमर्थ रहे।
तब, इंद्र ने कर्ण को पृथ्वी पर वापस जाने की सलाह दी, जहां उन्होंने इन्हीं सोलह दिनों के दौरान भोजन दान किया तथा अपने पूर्वजों का तर्पण किया और इस प्रकार दानवीर कर्ण पितृ ऋण से मुक्त हुए।

संबंधित अन्य नाम
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श्राद्ध पक्ष, कनागत, महालय पक्ष, सर्वपितृ अमावस्या, महालय अमावस्या, अपरा पक्ष, पितृ अमावस्या।
सर्वपितृ अमावस्या
जिन लोगों को अपने पितरों के पुण्यतिथि के बारे में तारीख या दिन का पता नहीं है वैसे लोग सर्वपितृ अमावस्या के दिन अपने पितरों को श्राद्ध लेकर श्रद्धांजलि और भोजन समर्पित करके उन लोगों को याद कर सकते हैं।पितृपक्ष के अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या या महालया अमावस्या के रूप में किसको जाना जाता है।

श्राद्ध की तिथियाँ
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प्रोष्ठपदी/पूर्णिमा का श्राद्ध
बाकी सभी श्राद्ध तिथि के अनुसार ही हैं-
प्रतिपदा श्राद्ध, द्वितीया श्राद्ध, तृतीया श्राद्ध, चतुर्थी श्राद्ध, पंचमी श्राद्ध, षष्ठी श्राद्ध, सप्तमी श्राद्ध, अष्टमी श्राद्ध, नवमी श्राद्ध, दशमी श्राद्ध, एकादशी श्राद्ध, त्रयोदशी श्राद्ध।
द्वादशी
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संन्यासियों का श्राद्ध।
चतुर्दशी
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चतुर्दशी तिथि के दिन शस्त्र, विष, दुर्घटना से मृतों का श्राद्ध होता है चाहे उनकी मृत्यु किसी अन्य तिथि में हुई हो।
अमावस
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अमावस का श्राद्ध, अज्ञात तिथि वालों का श्राद्ध, सर्वपितृ श्राद्ध।

श्राद्ध की मान्यताएं
आपने अपने पितरों के लिए श्रद्धा से किया गया तर्पण, पिण्ड तथा दान को ही श्राद्ध कहते है। मान्यता अनुसार सूर्य के कन्याराशि में आने पर पितृ परलोक से उतर कर अपने पुत्र-पौत्रों के साथ रहने आते हैं, अत: इसे कनागत भी कहा जाता है।
प्रत्येक मास की अमावस्या को पितरों की शांति के लिये पिंड दान या श्राद्ध कर्म किये जा सकते हैं, परंतु पितृ पक्ष में श्राद्ध करने का महत्व अधिक माना जाता है।
पितृ पक्ष में पूर्वज़ों का श्राद्ध कैसे करें?
जिस पूर्वज, पितर या परिवार के मृत सदस्य के परलोक गमन की तिथि अगर याद हो तो पितृपक्ष में पडऩे वाली उसी तिथि को ही उनका श्राद्ध करना चाहिये। यदि देहावसान की तिथि ज्ञात हो तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध किया जा सकता है, जिसे सर्वपितृ अमावस्या को महालय अमावस्या भी कहा जाता है। समय से पहले यानि कि किसी दुर्घटना अथवा आत्मदाह आदि से अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है।
श्राद्ध तीन पीढिय़ों तक करने का विधान बताया गया है। यमराज हर वर्ष श्राद्ध पक्ष में सभी जीवों को मुक्त कर देते हैं, जिससे वह अपने स्वजनों के पास जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें। तीन पूर्वज में पिता को वसु के समान, रुद्र देवता को दादा के समान तथा आदित्य देवता को परदादा के समान माना जाता है। श्राद्ध के समय यही अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं।

श्राद्ध अनुष्ठानों के लिए भारत के पवित्र स्थान
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हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भारत में कुछ महत्वपूर्ण जगहें हैं जो निर्वासित आत्माओं की शांति और खुश रहने के लिए श्रद्धा अनुष्ठान करने के लिए प्रसिद्ध हैं।
वाराणसी, उत्तर प्रदेश
प्रयाग (इलाहाबाद), उत्तरप्रदेश
गया, बिहार
केदारनाथ, उत्तराखंड
बद्रीनाथ, उत्तराखंड
रामेश्वरम, तमिलनाडु
नासिक, महाराष्ट्र
कपालमोचन सरोवर, यमुना नगर, हरियाणा।

आज से शुरू होंगे पितृ पक्ष
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 जानिए तिथि, श्राद्ध के नियम, विधि और महत्व
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हिंदू पंचांग के अनुसार पितृ पक्ष अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ते हैं. इनकी शुरुआत पूर्णिमा तिथि से होती है और समापन अमावस्या पर होता है. अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक हर साल सितंबर के महीने में पितृ पक्ष की शुरुआत होती है।

1 सितंबर से शुरू हो रहे हैं श्राद्ध
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पितृ पक्ष के दौरान दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध (Shradh) किया जाता है. माना जाता है कि यदि पितर नाराज हो जाएं तो व्यक्ति का जीवन भी परेशानियों और तरह-तरह की समस्याओं में पड़ जाता है और खुशहाल जीवन खत्म हो जाता है. साथ ही घर में भी अशांति फैलती है और व्यापार और गृहस्थी में भी हानी होती है. ऐसे में पितरों को तृप्त करना और उनकी आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में श्राद्ध (Pitru Paksha Shraddha) करना बेहद आवश्यक माना जाता है.
श्राद्ध के जरिए पितरों की तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है और पिंड दान (Pind Daan) और तर्पण (Tarpan) कर उनकी आत्मा की शांति की कामना की जाती है।

इस साल कब है पितृ पक्ष?
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हिंदू पंचांग के अनुसार पितृ पक्ष अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ते हैं. इनकी शुरुआत पूर्णिमा तिथि से होती है और समापन अमावस्या पर होता है. अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक हर साल सितंबर के महीने में पितृ पक्ष की शुरुआत होती है. आमतौर पर पितृ पक्ष 16 दिनों का होता है. इस साल पितृ पक्ष 1 सितंबर से शुरू हो कर 17 सितंबर को खत्म होगा।
1 सितंबर- पूर्णिमा का श्राद्ध, 2 सितंबर- प्रतिपदा का श्राद्ध, 3 सितंबर- द्वितीया का श्राद्ध, 5 सितंबर- तृतीया का श्राद्ध, 6 सितंबर- चतुर्थी का श्राद्ध, 7 सितंबर- पंचमी का श्राद्ध, 8 सितंबर- षष्ठी का श्राद्ध, 9 सितंबर- सप्तमी का श्राद्ध, 10 सितंबर- अष्टमी का श्राद्ध, 11सितंबर- नवमी का श्राद्ध, 12 सितंबर- दशमी का श्राद्ध, 13 सितंबर- एकादशी का श्राद्ध, 14 सितंबर- द्वादशी का श्राद्ध, 15 सितंबर- त्रयोदशी का श्राद्ध, 16 सितंबर- चतुर्दशी का श्राद्ध, 17 सितंबर- अमावस का श्राद्ध।

पितृ पक्ष का महत्व
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हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व माना जाता है. हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद मृत व्यक्ति का श्राद्ध किया जाना बेहत जरूरी माना जाता है. माना जाता है कि यदि श्राद्ध किया जाए तो मरने वाले व्यक्ति की आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती है. वहीं ये भी कहा जाता है कि पितृ पक्ष के दौरान पितरों का श्राद्ध करने से वो प्रसन्न हो जाते हैं और उनकी आत्मा को शांति मिलती है. ये भी माना जाता है कि पितृ पक्ष में यमराज पितरो को अपने परिजनों से मिलने के लिए मुक्त कर देते हैं. इस दौरान अगर पितरों का श्राद्ध किया जाए तो उनकी आत्मा दुखी नाराज हो जाती है।

पितृ पक्ष में किस दिन करें श्राद्ध
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दरअसल, दिवंगत परिजन की मृत्यु की तिथि में ही श्राद्ध किया जाता है. उदाहरण के तौर पर यदि आपके किसी परिजन की मृत्यु प्रतिपदा के दिन हुई है तो प्रतिपदा के दिन ही उनका श्राद्ध किया जाना चाहिए. आमतौर पर इसी तरह से पितृ पक्ष में श्राद्ध की तिथियों का चयन किया जाता है:
- जिन परिजनों की अकाल मृत्यु या फिर किसी दुर्घटना या आत्महत्या का मामला है तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है.
- दिवंगत पिता का श्राद्ध अष्टमी और मां का श्राद्ध नवमी के दिन किया जाता है.
- जिन पितरों के मरने की तिथि मालूम हो, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन करना चाहिए.
- यदि कोई महिला सुहागिन मृत्यु को प्राप्त हुई तो उनका श्राद्ध नवमी को करना चाहिए.
- सन्यासी का श्राद्ध द्वादशी के दिन किया जाता है.

श्राद्ध के नियम
- पितृ पक्ष के दौरान हर दिन तर्पण किया जाना चाहिए. पानी में दूध, जौ, चावल और गंगाजल डालकर तर्पण किया जाता है.
- इस दौरान पिंड दान भी करना चाहिए. श्राद्ध कर्म में पके हुए चावल, दूध और तिल को मिलाकर पिंड बनाए जाते हैं. पिंड को शरीर के प्रतीक के रूप में देखा जाता है.
- पितृ पक्ष में कोई भी शुभ कार्य, विशेष पूजा-पाठ और अनुष्ठान नहीं करना चाहिए. हालांकि, देवताओं की नित्य पूजा को बंद नहीं करना चाहिए.
- श्राद्ध के दौरान पाना खाने, तेल लगाने और संभोग की मनाही है.
- इस दौरान रंगीन फूलों का भी इस्तेमाल नहीं किया जाता है.
- पितृ पक्ष में चना, मसूर, बैंगन, हींग, शलजम, मांस, लहसुन, प्याज और काला नमक भी नहीं खाया जाता है.
- इस दौरान नए वस्त्र, नया भवन, गहने या कीमती सामान को खरीदने से भी कई लोग परहेज करते हैं।

श्राद्ध कैसे करें?
- श्राद्ध की तिथि का चयन ऊपर दी गई जानकारी के मुताबिक करें.
- श्राद्ध करने के लिए आप अपने पुरोहित को बुला सकते हैं.
- श्राद्ध के दिन अच्छा खाना या फिर पितरों की पसंद का खाना बनाएं.
- खाने में लहसुन और प्याज का इस्तेमाल करें.
- मान्यता के मुताबिक श्राद्ध के दिन स्मरण करने से पितर घर आते हैं और भोजन पाकर तृप्त हो जाते हैं.
- श्राद्ध के दिन पांच तरह की बलि बताई गई है: गौ (गाय) बलि, श्वान (कुत्ता) बलि, काक (कौवा) बलि, देवादि बलि, पिपीलिका (चींटी) बलि.
- बता दें, यहां बलि का मतलब किसी पशु या जीव की हत्या नहीं है बल्कि श्राद्ध के दिन इन सभी जानवरों को खाना खिलाया जाता है.
- तर्पण और पिंड दान के बाद पुरोहित या किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं और दक्षिणा दें.
- ब्राह्मण को सीधा या  सीदा भी दिया जाता है. सीधा में चावल, दाल, चीनी, नमक, मसाले, कच्ची सब्जियां, तेल और मौसमी फल शामिल है.
- ब्राह्मण भोज के बाद पितरों को धन्यवाद दें और जाने-अनजाने में हुई भूल के लिए माफी मांगे.
- इसके बाद अपने पूरे परिवार के साथ बैठ कर भोजन करें।
*पितृ पक्ष ( Ancestral):-*

इस वर्ष  2 सितंबर से 17 सितंबर तक 16 दिनों का होगा पितृपक्ष l पितृपक्ष में दो शब्द है l पितृ और पक्ष l

पितृ :-

पितृ अर्थात पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, प्रमाता वृद्ध प्रमाता, चाचा - चाची, बड़े भाई - भाभी और भी छोटे बड़े लोग घर परिवार के वे सभी सदस्य जो इस धरती पर नहीं है l अर्थात जिनकी मृत्यु हो गई हैनाना नानी को भी पितर कहा जाता है l

पक्ष :-

पक्ष दो तरह का होता है l एक शुक्ल पक्ष और दूसरा कृष्ण पक्ष, कृष्ण पक्ष पितरों के लिए निर्धारित किया गया है l अश्विन मास के कृष्ण को पितृपक्ष कहा जाता है l पितृ पक्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से आरंभ होकर आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को समाप्त होता है l


यह पुर पूरे 16 दिनों का पक्ष होता है l कभी-कभी तिथि के छय होने से पितृपक्ष 15 अथवा 14 दिनों का भी होता है  l

वर्ष 2020 में 16 दिनों का पितृपक्ष होगा जो 2 सितंबर 2020 बुधवार से आरंभ होकर 17 सितंबर गुरुवार 2020  को सर्वपितृ अमावस्या अथवा महालया या पितृ विसर्जन के रूप में संपन्न हो जाएगा l इस प्रकार इस वर्ष का पितृपक्ष कुल 16 दिनों का है l

महालया आरंभ 1 सितंबर से और समाप्ति 17 सितंबर को सर्वपैतृ अमावस्या के साथ संपन्न l

पितर ( पितृ ) किन्हे कहा गया है ?

माता - पिता, पितामह - पितामही, प्रपितामह - प्रपितामहीचाचा- चाची, भाई, भतीजा, बुआ, बहन- बेटी, नाना- नानी और मामा के अलावे वे सभी लोग जो लोग जीवित नहीं है l वे सभी पितृ की श्रेणी में आते हैं l

पितृ तर्पण से क्या लाभ है  ?

ऐसी शास्त्रीय मान्यता है की पितरों का तर्पण और उनके तिथि पर श्राद्ध करने से पितृ गण तृप्त होते हैं l और तर्पण करने वाले अपने वंशज को वंश वृद्धि तथा जन धन से संपन्न होने का आशीर्वाद देते हैं l जो लोग नियमित प्रतिवर्ष

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